Friday, 23 June 2017

पलायन एक चिंतन :उत्तराखंड

अपने जिन हकों और सपनों को लेकर उत्तराखंड अलग हुआ था उनमें से हक तो उसे पूरे मिले लेकिन सपने एक के बाद एक टूटते रहे हैं। उत्तर प्रदेश से अलग होकर अपना उत्तराखंड का नारा बुलंद करने वाले यहां के लोगों को विकास के नाम पर विस्थापन मिला। पर्यावरण और क्षेत्रीय निवासियों की चिंता किनारे रखकर चल रहीं विद्युत परियोजनाओं ने हजारों लोगों को विस्थापित किया और हजारों एकड़ खेती योग्य जमीन बांध और विशाल जलाशय की भेंट चढ़ गई। बेरोजगारी युवकों को पलायन के लिए मजबूर कर रही है। किसी के पास बदतर होते हालात का इलाज नहीं है। सामरिक दृष्टि से संवेदनशील होने, जनजातीय निवासियों के जीवन में आ रहे बदलावों, बेरोजगारी से युवाओं में पनप रहे असंतोष और पर्यावरण संरक्षण आदि के नाम पर केंद्र सरकार से मिलने वाली राशि आखिर किसी का कितना भला कर सकती है। खासकर तब जब उनका समुचित इस्तेमाल न हो रहा हो।

 पहाड़ बनाम मैदान के संघर्ष की ओर भी राज्य खिसकता जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि सामरिक दृष्टि से अति संवेदनशील भारत-तिब्बत सीमा हो या भारत-नेपाल सीमा, इनसे सटे गांव साल-दर-साल खाली हो रहे हैं।  तमाम गांवों से युवाओं का तो सौ फीसदी तक पलायन हो चुका है। समाजविज्ञानी चिंतित हैं और सेना जवान नहीं ढूंढ पा रही है। एक बड़ा सवाल है कि आखिर सीमांत से हो रहा युवाओं का पलायन रुके  तो  कैसे? सीमाओं पर द्वितीय रक्षा पंक्ति की तरह जमे इन क्षेत्रों के ग्रामीण विकास की बाट जोहते-जोहते नाउम्मीद हो, यहां से पलायन करने में ही भलाई समझ रहे हैं।

दरअसल, उत्तराखंड के सीमांत इन गांव बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह महरूम हैं। पक्की सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह नदारद हैं। जबकि इसके बरअक्स सीमा के उस पार चीन अधिकृत तिब्बत में तमाम विपरीत हालातों के होते हुए भी विकास की कोशिशें तेजी से साकार हो रही है। वहां रेल से लेकर सड़क एवं संचार नेटवर्क आदि के विकास ने चीनियों की भारतीय सीमा तक पहुंच आसान कर दी है। भारतीय क्षेत्र में असंतोष के मद्देनजर चीन लगातार भारतीय सीमा में पहुंचने की ताक में लगा रहता है।अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के बाद चीन की नजर अब उत्तराखंड में घुसपैठ पर लगी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि राज्य के चमोली जिले के बाराहोती क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने पिछले वर्षोँ में  घुसपैठ करने की कोशिश की है।

चीन  ने ल्हासा के किंगाई प्रांत तक रेल लाइन बिछा दी है तो भारतीय सीमा के गांव आज भी सड़क की बाट जोह रहे हैं। चीनी सीमांत क्षेत्र में विकास के प्रवाह से जनजीवन बेहतर हुआ है। जबकि भारतीय सीमांत इलाकों की बदहाली यहां के युवाओं को पलायन के लिए मजबूर कर रही है। स्थिति कितनी विकराल है इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि पिछले कुछ  वर्षों में पन्द्रह  लाख से ज्यादा लोग अपना गांव-घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। दो लाख घरों में ताले पड़ गए हैं।

राज्य के युवाओं के पास रोजगार नहीं है और उनका यहां रुकना दूभर हो गया है। सात लाख से अधिक युवा बेरोजगारी की कतार में भिन्न रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत हैं। पिछले  वर्षों में सरकारों ने विभिन्न पदों के लिए भर्ती हेतु विज्ञापन तो निकाले लेकिन भर्ती नहीं हुई। दिनोदिन सुरसा की तरह मुंह फैलाती बैरोजगारी के बावजूद यहां के कल-कारखानों में स्थानीय लोगों को नौकरी देने में प्राथमिकता नहीं  क्योंकि इसके लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई है जबकि ये कल-कारखाने माकूल जमीनों पर लगाए गए हैं जिसने यहां के लोगों की रोटी छीनी है।


रा ज्य की खुशहाली का पर्याय बताई जा रही जलविद्युत परियोजनाओं ने भी यहां के लोगों को अब तक सिवाय विस्थापन और आपदाओं के कुछ और नहीं दिया है। उत्तराखंड में 558 जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं जो भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी और नदी सहायक जलधाराओं पर चल रही है या चलने वाली हैं। इन्हें भी संतों, पर्यावरणविदों व स्थानीय निवासियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। निर्माणाधीन योजनाओं में से कुछ परियोजनाएं संतों के विरोध के चलते बंद कर दी गई है। कई परियोजनाएं ऐसी हैं जो कि ग्रामीणों एवं स्थानीय नागरिकों के भी विरोध का कारण बनी हैं। 558 परियोजनाएं यदि पूरी बन गई तो इन परियोजनाओं के निर्माण के लिए उत्तराखंड की नदियों में लगभग 1,500 किलोमीटर की सुरंग बनानी पड़ेगी। इन सुरंगों में इन नदियों का पानी बहेगा। इससे लोगों को भय है कि वर्तमान नदियों का मार्ग इससे वीरान हो जाएगा।


 इन प्रस्तावित परियोजनाओं के कारण विस्थापन का सवाल भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। दिनोंदिन खेती योग्य यहां की जमीन बांधों एवं बांध विस्थापितों के पुनर्वास में ही खत्म हो रही है। विकास का विनाशकारी मॉडल सामने आ रहा है। उससे नदियां, जंगल और जमीन सभी खतरे में हैं। इनसे जुड़े लोगों पर खतरा लाजिमी है। इन बांध परियोजनाओं से न केवल विस्थापन बल्कि पारिस्थितिकीय असंतुलन का भी खतरा पैदा हो गया है। इंटरनेशनल कमीशन फॉर स्नो एंड आइस ने तो एक अध्ययन के मद्देनजर चेताया है कि अगले 50 वर्षों में हिमालय के 50 हिमनद (ग्लेशियर) समाप्त हो सकते हैं। गौमुख पर खतरा किसी से छिपा नहीं रह गया है। लगातार सिकुड़ते इस हिमनद ने पिछले वर्षों में खूब सुर्खियों बटोरी है।


राज्य में खेती की जमीन भी लगातार सिकुड़ रही है। राज्य बनने के बाद विभिन्न योजनाओं के लिए खेती की जमीन विकास की भेंट चढ़ी और जमीन से स्थानीय किसान हाथ धोते चले गए। अब ये बिल्डर पूरे राज्य में पांव पसार रहे हैं। एक तो यूं भी राज्य के कुल क्षेत्रफल की महज तेरह फीसदी जमीन खेती योग्य है और यदि हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर जिलों को छोड़ दे तो शेष पहाड़ी जिलों में मात्र सात प्रतिशत भाग ही खेती के लिए बचता है। ऊपर से वहां भी खेती की जमीन लगातार विकास के नाम पर नष्ट की जा रही है। पंतनगर विवि के आसपास बने सिडकुल का उदाहरण लें तो पाते हैं कि इसके पास 14 हजार एकड़ जमीन हुआ करती थी। राज्य बनने के बाद आठ हजार एकड़ जमीन पर सिडकुल यानी राज्य औद्योगिक विकास संस्थान लगने से मात्र 6 हजार एकड़ ही अब विश्वविद्यालय के शोध एवं अन्य कार्यों के लिए बची है। ऐसे ही हरिद्वार, देहरादून और अन्य जिलों में बड़ी मात्रा में जमीनें बिल्डर्स प्रमोटर्स गतिविधियों की भेंट चढ़ी हैं।


पूरे देश में करीब 14 करोड़ हेक्टेयर खेतिहर जमीन है। बढ़ते शहरीकरण व खेती की जमीन का अन्य कामों में इस्तेमाल आदि के चलते 2050 तक लगभग दो करोड़ हेक्टेयर तक खेती योग्य जमीन कम हो जाएगी। इस हिसाब से एक दिन में 1,441 हेक्टेयर से ज्यादा उपजाऊ भूमि खत्म हो रही है। जबकि 2050 में आबादी बढ़कर एक अरब 70 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। इतनी आबादी के लिए सालाना 37 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी। कुल मिलकर भूमि का अविवेकी दोहन भविष्य के लिए बड़े खतरे को जन्म देने वाला साबित होने वाला है।




Source-National Inda,India Water Portal  ::Mr.Mahesh 

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